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आध्यात्मिकता के क्षेत्र में प्रवेश करते ही जीवन का लक्ष्य बदलने लगता है. एक साधारण व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य इन्द्रियजनित सुख प्राप्त करना तथा अपने परिवार का पालन-पोषण करना होता है. इस लक्ष्य से आसक्ति और राग उत्पन्न होकर मन को भौतिकवाद की ओर ढकेलते रहते हैं. आसक्ति और राग से जब दु:ख और शोक का उदय होता है तो आत्मा अनासक्ति और विराग से युक्त मन को परमात्मा की शरण में भेजता है. इस समय मन भौतिकवाद से मुक्त होता है और आध्यात्मिकता की ओर उन्मुख होता है. मन में उत्पन्न वैराग्य गृहस्थ जीवन से भी विरक्ति उत्पन्न करने लगता है. मन पलायनवादी होकर मनुष्य को संन्यासी बनने के लिए प्रेरित करने लगता है. कहा गया है कि ‘नारि मुई घर सम्पति नासी. मूड़ मुड़ाय भये संन्यासी’. सब संन्यासी बनकर भिक्षाटन से जीवन-निर्वाह करने लगें तो भीख देने वाले गृहस्थ ही नहीं रह जायेंगे. अत: कर्म करना अनिवार्य है. कर्म के बिना तो अपने शरीर का भी पोषण नहीं हो सकता. पलायनवाद या गृहस्थ जीवन के कर्तव्यों से विमुख होना जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकता. गेरुआ वस्त्र पहनकर घूमने वाले संन्यासी प्राय: अपने शिष्यों को पलायनवादी और व्यक्तिवादी बनाते हैं. वे कहते हैं, “माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी आदि के रिश्ते स्वार्थ पर आधारित हैं, अत: सब को छोड़ कर संन्यासी बन जाओ और कर्म में प्रवृत्ति त्याग कर केवल भगवान का भजन करो”. किन्तु गीता का कहना है कि साधक को सोचना चाहिए कि कर्म पर ही उसका अधिकार है, कर्मफल पर नहीं. उसे कर्मफल में आसक्ति को त्यागना चाहिए किन्तु अनासक्त होने के लिए कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए अर्थात् अकर्म में भी आसक्ति नहीं होनी चाहिए.





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