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जो व्यक्ति अपने कर्मफल के प्रति अनासक्त है और जो अपने कर्तव्य का पालन करता है, वही संन्यासी और असली योगी है. जिसे संन्यास कहते हैं उसे ही योग अर्थात् परब्रह्म से युक्त होना जानो क्योंकि इन्द्रिय-तृप्ति के लिए इच्छा को त्यागे बिना कोई कभी योगी नहीं हो सकता. जब कोई व्यक्ति समस्त भौतिक इच्छाओं का त्याग करके न तो इन्द्रिय तृप्ति के लिए कार्य करता है और न सकाम कर्मों में प्रवृत होता है तो वह योगारूढ़ कहलाता है. मनुष्य को चाहिए कि अपने मन की सहायता से अपना उद्धार करे और अपने को नीचे न गिरने दे. यह मन बद्ध जीव का मित्र भी है और शत्रु भी. जिसने मन को जीत लिया है उसके लिए मन सर्वश्रेष्ठ मित्र है, किन्तु जो ऐसा नहीं कर पाया उसके लिए सबसे बड़ा शत्रु बना रहेगा. जिसने मन को जीत लिया है, उसने पहले ही परमात्मा को प्राप्त कर लिया है, क्योंकि उसने शान्ति प्राप्त कर ली है. ऐसे पुरुष के लिए सुख-दु:ख, सर्दी-गर्मी एवं मान-अपमान एक से हैं. वह व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त तथा योगी कहलाता है जो अपने अर्जित ज्ञान तथा अनुभूति से पूर्णतया सन्तुष्ट रहता है. ऐसा व्यक्ति अध्यात्म को प्राप्त तथा जितेन्द्रिय कहलाता है. वह सभी वस्तुओं को (चाहे वे कंकड़ हों, पत्थर हों या कि सोना) एक समान देखता है. जब मनुष्य निष्कपट हितैषियों, प्रिय मित्रों, तटस्थों, मध्यस्थों, ईर्ष्यालुओं, शत्रुओं तथा मित्रों, पुण्यात्माओं एवं पापियों को समान भाव से देखता है तो वह और भी उन्नत माना जाता है. वास्तविक योगी समस्त जीवों में परमात्मा को, परमेश्वर में समस्त जीवों को देखता है, वह स्वरूपसिद्ध व्यक्ति परमेश्वर को सर्वत्र देखता है. नि:स्संदेह चंचल मन को वश में करना अत्यन्त कठिन है, किन्तु निरन्तर अभ्यास द्वारा तथा विरक्ति द्वारा ऐसा सम्भव है.





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