परमेश्वर न तो किसी के पापों को ग्रहण करता है, न पुण्यों को.



तत्त्व को जानने वाला सांख्ययोगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा ऑंखों को खोलता और मीचता हुआ भी, सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थों में बर्त रही हैं इस प्रकार समझता हुआ, नि:संदेह ऐसे माने कि वह कुछ भी नहीं करता है. जो व्यक्ति सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्याग कर कर्म करता है वह पुरुष जल से कमल के पत्ते की तरह पाप से लिपायमान नहीं होता. निष्काम कर्मयोगी (ममत्व बुद्धिरहित) केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति को त्याग कर आत्मशुद्धि के लिए कर्म करते हैं. निष्काम कर्मयोगी कर्मों के फल को परमेश्वर को अर्पण करके भगवत् प्राप्ति रूप शान्ति को प्राप्त होता है और सकामी पुरुष फल में आसक्त हुआ कामना के द्वारा बँधता है. जब देहधारी जीवात्मा अपनी प्रकृति को वश में कर लेता है और मन से समस्त कर्मों का परित्याग कर देता है तब वह भौतिक शरीर में आनन्दपूर्वक परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है. ईश्वर न तो कर्तापन को, न ही कर्मों को और न ही कर्मफल को सृजित करता है, यह सब तो प्रकृति के गुणों द्वारा सृजित होता है. परमेश्वर न तो किसी के पापों को ग्रहण करता है, न पुण्यों को. किन्तु सारे देहधारी जीव उस अज्ञान के कारण मोहग्रस्त रहते हैं, जो उनके वास्तविक ज्ञान को आच्छादित किये रहता है. किन्तु जब कोई उस ज्ञान से प्रबुद्ध होता है, जिससे अविद्या का विनाश होता है तो उसके ज्ञान से सब कुछ उसी तरह प्रकट हो जाता है, जैसे दिन में सूर्य से सारी वस्तुएँ प्रकाशित हो जाती हैं.

 
 
श्री सुशील कुमार रचित गौरवशाली भारत (साहित्‍य सेवा सदन, निराला नगर, रायबरेली द्वारा प्रकाशित) पुस्‍तक से उद्धृत Excerpt from the book 'Gauravshali Bharat' written by Sushil Kumar Srivastava & published by 'Sahitya Sewa Sadan', Nirala Nagar, Rae Bareli

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